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आपराधिक केस में राज़ीनामा / समझौता — BNSS धारा 359 (पुरानी CrPC 320) में कौन से अपराध शमनीय हैं, कोर्ट की अनुमति, समझौते पर हाई कोर्ट से FIR रद्द (BNSS 528 / पुरानी 482), चेक बाउंस में समझौता और किन मामलों में समझौता नहीं होता (2026)
शिकायतकर्ता और आरोपी, दोनों के लिए सरल गाइड: ‘शमन’ (compounding) क्या है, BNSS की दो तालिकाएँ (कोर्ट की अनुमति के साथ और बिना), मारपीट, धमकी, धोखाधड़ी, अमानत में ख़यानत और अतिक्रमण जैसे आम उदाहरण पुरानी IPC धाराओं के साथ, कोर्ट में समझौता कैसे दर्ज होता है, समझौते के बाद हाई कोर्ट कब ग़ैर-शमनीय FIR रद्द कर सकता है, चेक बाउंस के विशेष नियम और किन अपराधों में समझौता नहीं होता। केवल शैक्षिक जानकारी — कानूनी सलाह नहीं। अधिवक्ता समझौता-पत्र नहीं बनाता, पक्षों से बातचीत नहीं करता और कोर्ट में पेश नहीं होता।
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‘शमन’ (compounding) का मतलब
शमन एक क़ानूनी समझौता है जिसमें पीड़ित मुक़दमा ख़त्म करने पर सहमत होता है, और क़ानून इसे आरोपी की दोषमुक्ति (acquittal) मानता है (BNSS धारा 359(8), पुरानी CrPC 320(8))। यह केवल BNSS धारा 359 की दो तालिकाओं में लिखे अपराधों में होता है; बाक़ी किसी अपराध का इस धारा में शमन नहीं हो सकता (धारा 359(9))। 1 जुलाई 2024 से तालिकाओं में पुरानी IPC की जगह भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धाराएँ हैं। उस तारीख़ को पहले से लंबित मामले आम तौर पर पुरानी CrPC प्रक्रिया से चलते हैं (BNSS धारा 531), इसलिए देखें कि आपके केस पर कौन सा क़ानून लागू है।
तालिका 1 — पीड़ित बिना कोर्ट की अनुमति समझौता कर सकता है
आम उदाहरण: स्वेच्छा से चोट पहुँचाना, BNS धारा 115(2) (पुरानी IPC 323); सदोष अवरोध / परिरोध, धारा 126(2) / 127(2) (पुरानी 341 / 342); हमला या आपराधिक बल, धारा 131 (पुरानी 352); चोरी, धारा 303(2) (पुरानी 379); छल, धारा 318(2) (पुरानी 417); आपराधिक अतिचार और गृह-अतिचार, धारा 329(3) / (4) (पुरानी 447 / 448); निजी व्यक्ति को नुक़सान वाली रिष्टि, धारा 324(2) / (4) (पुरानी 426 / 427); आपराधिक धमकी, धारा 351(2) / (3) (पुरानी 506); जानबूझकर अपमान, धारा 352 (पुरानी 504); मानहानि, धारा 356(2) (पुरानी 500)। तालिका में बताया गया व्यक्ति — आम तौर पर जिसे चोट लगी, धोखा हुआ या धमकी मिली — उसी कोर्ट में समझौता दाखिल करता है जहाँ केस लंबित है।
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तालिका 2 — केवल कोर्ट की अनुमति से समझौता
कुछ अपराधों में समझौता तभी होता है जब कोर्ट अनुमति दे, जैसे: स्त्री की लज्जा का अपमान करने वाले शब्द, इशारा या कार्य, BNS धारा 79 (पुरानी 509); द्विविवाह, धारा 82(1) (पुरानी 494); गंभीर चोट, धारा 117(2) (पुरानी 325); उतावलेपन या लापरवाही से चोट / गंभीर चोट, धारा 125(a) / (b) (पुरानी 337 / 338); आपराधिक न्यासभंग (अमानत में ख़यानत), धारा 316(2) (पुरानी 406); छल करके संपत्ति हड़पना, धारा 318(4) (पुरानी 420)। अनुमति देने से पहले कोर्ट देखता है कि समझौता स्वेच्छा से और सच्चा है। सत्र न्यायालय को सुपुर्दगी के बाद या अपील के दौरान उसी कोर्ट की अनुमति ज़रूरी है (धारा 359(5))।
किन अपराधों में शमन नहीं होता
गंभीर अपराध किसी तालिका में नहीं हैं — जैसे बलात्कार, BNS धारा 64 (पुरानी 376); हत्या का प्रयास, धारा 109 (पुरानी 307); लज्जा भंग के इरादे से हमला, धारा 74 (पुरानी 354); पति या रिश्तेदारों द्वारा क्रूरता, धारा 85 / 86 (पुरानी 498A); दहेज मृत्यु, धारा 80 (पुरानी 304B); और विशेष क़ानूनों के अपराध, जब तक वह क़ानून ख़ुद शमन की अनुमति न दे। अगर पिछली सज़ा के कारण आरोपी को बढ़ी हुई सज़ा हो सकती है, तब भी शमन नहीं होता (धारा 359(7))। ग़ैर-शमनीय अपराधों में निजी समझौते से केस अपने आप बंद नहीं होता; पक्ष केवल हाई कोर्ट से उसकी अंतर्निहित शक्ति के इस्तेमाल की माँग कर सकते हैं।
समझौता आम तौर पर कैसे दर्ज होता है
आम कदम: दोनों पक्ष लिखित समझौता (अक्सर शपथ-पत्र के साथ) पर दस्तख़त करते हैं कि यह स्वेच्छा से और बिना दबाव के है; केस नंबर के साथ ट्रायल कोर्ट में समझौता आवेदन दाखिल होता है; शिकायतकर्ता / पीड़ित ख़ुद पेश होता है और कोर्ट बयान दर्ज करता है; तालिका 2 के अपराधों में कोर्ट अनुमति पर फ़ैसला करता है; फिर कोर्ट शमन दर्ज कर उस अपराध में आरोपी को दोषमुक्त करता है। पीड़ित बच्चा या मानसिक रूप से अस्वस्थ हो तो उसकी ओर से अनुबंध करने में सक्षम व्यक्ति कोर्ट की अनुमति से, और पीड़ित की मृत्यु हो गई हो तो विधिक प्रतिनिधि कोर्ट की सहमति से समझौता कर सकता है (धारा 359(4))। आदेश की प्रति सँभालकर रखें।
समझौते के बाद ग़ैर-शमनीय FIR रद्द कराना — हाई कोर्ट
हाई कोर्ट के पास न्याय के हित में कार्यवाही रद्द करने की अंतर्निहित शक्ति है — अब BNSS धारा 528 (पुरानी CrPC 482)। ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जहाँ विवाद मुख्यतः दीवानी, व्यावसायिक, वैवाहिक या पारिवारिक प्रकृति का हो, वहाँ सच्चे समझौते के बाद यह शक्ति इस्तेमाल हो सकती है, लेकिन हत्या, बलात्कार, डकैती जैसे जघन्य अपराधों या समाज के विरुद्ध अपराधों में नहीं। बी.एस. जोशी (2003) में समझौते के बाद 498A सहित वैवाहिक मामले रद्द करने की अनुमति दी गई; नरिंदर सिंह (2014) और परबतभाई आहीर (2017) में सीमाएँ समझाई गईं, जिनमें हत्या के प्रयास वाले मामले भी शामिल हैं। यह कोर्ट का विवेक है, हर केस में अलग — रद्द होने का कोई स्वतः अधिकार नहीं।
चेक बाउंस (NI Act धारा 138) — विशेष नियम
परक्राम्य लिखत अधिनियम के सभी अपराध किसी भी चरण पर शमनीय हैं (NI Act धारा 147)। दामोदर एस. प्रभु (2010) में सुप्रीम कोर्ट के ख़र्च संबंधी दिशानिर्देश संजबिज तारी बनाम किशोर एस. बोरकर (25 सितंबर 2025) में बदले गए: मोटे तौर पर, बचाव साक्ष्य से पहले भुगतान पर बिना अतिरिक्त ख़र्च शमन, और बाद के चरणों (बचाव साक्ष्य के बाद ट्रायल, सत्र / हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट) में क्रमशः बढ़ता ख़र्च; कोर्ट कारण लिखकर ख़र्च घटा सकता है। ऐसे समझौतों के लिए लोक अदालत और मध्यस्थता केंद्र आम हैं। भुगतान से पहले अपने कोर्ट का ताज़ा आदेश देखें।
राज्यों के अंतर और व्यावहारिक सावधानियाँ
कुछ राज्यों ने पुरानी CrPC की तालिका में संशोधन किया था (जैसे आंध्र प्रदेश ने 498A को कोर्ट की अनुमति से शमनीय बनाया था); BNSS में ऐसा कोई राज्य संशोधन लागू है या नहीं, अपने राज्य के लिए जाँचें। व्यावहारिक बातें: समझौता लिखित में करें, दोनों पक्षों के बीच हर केस (आपराधिक, दीवानी, भरण-पोषण, घरेलू हिंसा) और हर एक कैसे बंद होगा, लिखें; भुगतान ट्रेस होने वाले तरीक़े से करें; मौखिक वादों पर केस से पीछे न हटें; और याद रखें कि ग़ैर-शमनीय अपराध में चुप रहने के लिए पैसा लेना क़ानूनी समझौता नहीं है। समझौते के लिए धमकी या दबाव की शिकायत पुलिस या कोर्ट में की जा सकती है।
तैयार रखने वाले काग़ज़
FIR या शिकायत की प्रति और केस नंबर; चार्जशीट (अगर दाखिल हो); अगली तारीख़ और कोर्ट का नाम (eCourts केस स्टेटस); लिखित समझौता और दोनों पक्षों के पहचान-पत्र; किसी भुगतान का सबूत; संबंधित दीवानी या पारिवारिक मामलों की प्रतियाँ; और हाई कोर्ट में रद्द कराने के लिए निचली अदालत के पूरे काग़ज़ और समझौते का शपथ-पत्र।
अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है
हम समझौता-पत्र या याचिका नहीं बनाते, दूसरे पक्ष से बातचीत नहीं करते, और किसी कोर्ट या थाने में पेश नहीं होते। अधिवक्ता एक सुविधा प्लेटफ़ॉर्म है, लॉ फर्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने उपस्थित नहीं होते, और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ पर अपनी स्थिति लिखें, या तथ्यों और काग़ज़ों को व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक जानकारी — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- किन आपराधिक मामलों में राज़ीनामा हो सकता है?
- केवल BNSS धारा 359 (पुरानी CrPC 320) में लिखे अपराधों में। बिना कोर्ट अनुमति के उदाहरण: चोट (BNS 115(2), पुरानी 323), धमकी (351, पुरानी 506), अपमान (352, पुरानी 504), चोरी (303(2), पुरानी 379), अतिचार और मानहानि। कोर्ट अनुमति से: अमानत में ख़यानत (316(2), पुरानी 406), धोखाधड़ी (318(4), पुरानी 420), गंभीर चोट (117(2), पुरानी 325)।
- क्या 498A या बलात्कार केस में समझौता हो सकता है?
- नहीं, ये BNSS धारा 359 में शमनीय नहीं हैं। 498A (अब BNS धारा 85) जैसे वैवाहिक मामलों में सच्चे समझौते के बाद हाई कोर्ट अपनी अंतर्निहित शक्ति (BNSS 528, पुरानी 482) से कार्यवाही रद्द कर सकता है। बलात्कार और अन्य जघन्य अपराध केवल समझौते पर रद्द नहीं होते।
- राज़ीनामे का असर क्या होता है?
- कोर्ट द्वारा शमन दर्ज होने पर उस अपराध में आरोपी की दोषमुक्ति (बरी) जैसा असर होता है (BNSS धारा 359(8))।
- क्या चार्जशीट से पहले समझौते से FIR बंद हो सकती है?
- धारा 359 में शमन कोर्ट में होता है। केस कोर्ट पहुँचने से पहले, ख़ासकर ग़ैर-शमनीय अपराधों में, पक्ष अक्सर समझौते के आधार पर हाई कोर्ट से FIR रद्द कराने जाते हैं। केवल निजी समझौते से पुलिस केस बंद नहीं कर सकती।
- क्या चेक बाउंस केस में किसी भी चरण पर समझौता हो सकता है?
- हाँ। NI Act के सभी अपराध शमनीय हैं (धारा 147)। सुप्रीम कोर्ट के संशोधित दिशानिर्देशों (संजबिज तारी, सितंबर 2025) के तहत बचाव साक्ष्य से पहले समझौते पर अतिरिक्त ख़र्च नहीं; बाद के चरणों में क्रमशः ख़र्च लग सकता है, जिसे कोर्ट कारण लिखकर घटा सकता है।
- क्या केस निपटाने के लिए पैसा लेना क़ानूनी है?
- शमनीय या दीवानी प्रकृति के विवाद में कोर्ट के सामने दर्ज सच्चे समझौते के हिस्से के रूप में भुगतान आम है। गंभीर ग़ैर-शमनीय अपराध में चुप रहने के लिए पैसा लेना क़ानूनी समझौता नहीं है और इससे नई क़ानूनी परेशानी हो सकती है।
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