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कोर्ट मैरिज भारत — विशेष विवाह अधिनियम 1954: 30 दिन का नोटिस, आपत्ति, 3 गवाह, प्रमाणपत्र; अंतरधार्मिक विवाह और सुरक्षा (2026)
विशेष विवाह अधिनियम, 1954 के तहत ‘कोर्ट मैरिज’ का सादा चरणबद्ध नक्शा: कौन विवाह कर सकता है (धारा 4 — 21 / 18 वर्ष, कोई जीवित जीवनसाथी नहीं), उस ज़िले के विवाह अधिकारी को नोटिस जहाँ एक साथी 30 दिन रहा हो (धारा 5), प्रकाशन और 30 दिन की आपत्ति अवधि (धारा 6–7; उ.प्र. में वैकल्पिक प्रकाशन पर इलाहाबाद उच्च न्यायालय), तीन गवाहों के सामने विवाह (धारा 11–12), विवाह प्रमाणपत्र (धारा 13), पहले से हुए विवाह का पंजीकरण (धारा 15), हिंदू विवाह अधिनियम पंजीकरण से अंतर, उत्तराखंड UCC पंजीकरण नियम, और धमकी झेल रहे जोड़ों के लिए पुलिस सुरक्षा। केवल शैक्षिक — कानूनी सलाह नहीं; अधिवक्ता विवाह अधिकारी की अपॉइंटमेंट बुक नहीं करता या गवाह नहीं बनता।
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‘कोर्ट मैरिज’ से लोगों का क्या मतलब होता है
आम बोलचाल में ‘कोर्ट मैरिज’ का अर्थ आमतौर पर विशेष विवाह अधिनियम, 1954 (SMA) के तहत विवाह अधिकारी (राज्य अनुसार प्रायः ज़िलाधिकारी / SDM / उप-निबंधक कार्यालय में) द्वारा संपन्न और पंजीकृत सिविल विवाह है। SMA धर्म की परवाह किए बिना किन्हीं भी दो भारतीयों के लिए उपलब्ध है, इसलिए अंतरधार्मिक विवाह और धार्मिक रस्म न चाहने वाले जोड़ों का यह सामान्य रास्ता है। धार्मिक रीति से हो चुके विवाह का पंजीकरण अलग चीज़ है — हिंदू, बौद्ध, जैन और सिख के लिए हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 8 के तहत बने राज्य नियमों में (हमारी विवाह पंजीकरण गाइड देखें)।
कौन विवाह कर सकता है — धारा 4
विवाह के समय: किसी पक्ष का कोई जीवित जीवनसाथी न हो; दोनों वैध सहमति देने में सक्षम (स्वस्थ चित्त) हों; पुरुष कम से कम 21 और महिला कम से कम 18 वर्ष की हो; और वे प्रतिषिद्ध नातेदारी की डिग्री में न हों (जब तक कम से कम एक पर लागू रूढ़ि इसकी अनुमति न दे)। पहले विवाहित व्यक्ति तलाक की डिक्री या पूर्व जीवनसाथी का मृत्यु प्रमाणपत्र साथ रखें।
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चरण 1 — प्रस्तावित विवाह का नोटिस (धारा 5)
दोनों पक्ष दूसरी अनुसूची के फ़ॉर्म में लिखित नोटिस उस ज़िले के विवाह अधिकारी को देते हैं जहाँ नोटिस से ठीक पहले कम से कम 30 दिन उनमें से कम से कम एक रहा हो। कुछ राज्य ऑनलाइन पोर्टल से नोटिस लेकर फिर कार्यालय बुलाते हैं। सामान्य कागज़: आयु प्रमाण, 30 दिन के निवास का पता प्रमाण, फ़ोटो, और वैवाहिक स्थिति की घोषणा; बाद में गवाहों का पहचान-पत्र। शुल्क और सटीक फ़ॉर्म राज्य नियम तय करते हैं — आधिकारिक राज्य पोर्टल देखें।
चरण 2 — प्रकाशन और आपत्तियाँ (धारा 6–8)
विवाह अधिकारी नोटिस विवाह सूचना पुस्तिका में दर्ज कर कार्यालय में किसी सहज-दृश्य स्थान पर प्रकाशित करता है (और कोई पक्ष स्थायी रूप से दूसरे ज़िले में रहता हो तो वहाँ प्रति भेजता है)। प्रकाशन के 30 दिन के भीतर कोई भी व्यक्ति आपत्ति कर सकता है, पर केवल इस आधार पर कि धारा 4 की कोई शर्त टूट रही है (जैसे कम आयु, मौजूदा जीवनसाथी)। आपत्ति होने पर विवाह अधिकारी को जाँच कर निर्णय करना होता है; इनकार के विरुद्ध अधिनियम में दी गई अवधि में ज़िला न्यायालय में अपील हो सकती है। सफ़िया सुल्ताना बनाम उ.प्र. राज्य (इलाहाबाद उच्च न्यायालय, 12 जनवरी 2021) में न्यायालय ने कहा कि नोटिस का प्रकाशन और आपत्ति आमंत्रित करना निदेशात्मक है, अनिवार्य नहीं, और जोड़े लिखित में प्रकाशन न करने का अनुरोध कर सकते हैं — अन्य राज्यों में प्रथा अलग हो सकती है, विवाह अधिकारी से पूछें।
चरण 3 — तीन गवाहों के सामने विवाह (धारा 11–14)
30 दिन बाद (कोई वैध आपत्ति न हो तो) दोनों पक्ष और तीन गवाह विवाह अधिकारी के सामने तीसरी अनुसूची के फ़ॉर्म में घोषणा पर हस्ताक्षर करते हैं, जिसे अधिकारी प्रतिहस्ताक्षरित करता है (धारा 11)। विवाह अधिकारी के कार्यालय में या उचित दूरी के अन्य स्थान पर किसी भी रूप में हो सकता है, पर अधिकारी और गवाहों की उपस्थिति में, समझ में आने वाली भाषा में, हर पक्ष को दूसरे से धारा 12 में दिए शब्द कहने होते हैं। नोटिस के तीन कैलेंडर महीनों में विवाह न हो तो नया नोटिस देना होता है (धारा 14)।
प्रमाणपत्र और पहले से हुए विवाह का पंजीकरण (धारा 13, 15–16)
विवाह अधिकारी विवाह प्रमाणपत्र पुस्तिका में प्रमाणपत्र दर्ज करता है, जिस पर दोनों पक्ष और तीन गवाह हस्ताक्षर करते हैं; यह अधिनियम के तहत विवाह संपन्न होने का निर्णायक साक्ष्य है (धारा 13)। किसी अन्य रूप में हो चुका विवाह भी धारा 15 में पंजीकृत हो सकता है, यदि वहाँ की शर्तें पूरी हों (दोनों 21 वर्ष के हों, पति-पत्नी के रूप में साथ रह रहे हों, और ज़िले में 30 दिन निवास सहित), आपत्ति आमंत्रित करने वाले सार्वजनिक नोटिस के बाद (धारा 16)। SMA विवाहों के अपने तलाक प्रावधान (धारा 27–28) और उत्तराधिकार प्रभाव (धारा 19–21A) हैं।
उत्तराखंड — UCC पंजीकरण
उत्तराखंड समान नागरिक संहिता 27 जनवरी 2025 से लागू है। इसके लागू होने के बाद संपन्न विवाहों का 60 दिन के भीतर पंजीकरण (UCC पोर्टल से ऑनलाइन या ऑफ़लाइन) आवश्यक है। उत्तराखंड के निवासी देखें कि SMA प्रक्रिया के साथ यह कैसे लागू होता है।
धमकी झेल रहे जोड़े — सुरक्षा
वयस्कों को अपनी पसंद से विवाह का अधिकार है; सर्वोच्च न्यायालय ने कहा है कि पुलिस ऐसे जोड़ों को उत्पीड़न और हिंसा से बचाए (लता सिंह बनाम उ.प्र. राज्य, 2006) और ‘ऑनर’ अपराधों के विरुद्ध निवारक व उपचारात्मक उपाय तय किए (शक्ति वाहिनी बनाम भारत संघ, 2018)। धमकी हो तो 112 पर कॉल करें, SP को लिखित शिकायत दें और प्रतियाँ रखें; जोड़े अक्सर सुरक्षा आदेश के लिए उच्च न्यायालय जाते हैं। फ़ॉर्म में आयु, धर्म या वैवाहिक स्थिति के बारे में झूठ न लिखें — झूठी घोषणा अपराध है।
यह गाइड क्या नहीं है
यह बुकिंग या ‘एक दिन में शादी’ सेवा नहीं, विवाह अधिकारी द्वारा प्रकाशन छोड़ने का वादा नहीं, और धर्म-परिवर्तन, व्यक्तिगत-कानून परिणाम या उत्तराधिकार पर सलाह नहीं। फ़ॉर्म, शुल्क और पोर्टल राज्य-विशिष्ट हैं।
अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है
हम विवाह नोटिस दाखिल नहीं करते, गवाह की व्यवस्था नहीं करते, न विवाह अधिकारी या न्यायालय के सामने पेश होते हैं। अधिवक्ता (Adhiwakta) एक सुविधा मंच है, लॉ फ़र्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने पेश नहीं होते और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। अपनी स्थिति बताकर स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ का उपयोग करें, या तथ्य और कागज़ व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- कोर्ट मैरिज में कितने दिन लगते हैं?
- विशेष विवाह अधिनियम में नोटिस (धारा 5) के बाद प्रकाशन से 30 दिन की आपत्ति अवधि (धारा 7) होती है; उसके बाद विवाह हो सकता है और नोटिस के तीन महीने के भीतर होना चाहिए (धारा 14)। नोटिस से पहले एक साथी का ज़िले में 30 दिन निवास ज़रूरी है। कार्यालय की समय-सारिणी अलग से समय लेती है।
- कोर्ट मैरिज में कितने गवाह चाहिए?
- तीन गवाह, जो विवाह अधिकारी के सामने जोड़े के साथ घोषणा (धारा 11) और विवाह प्रमाणपत्र (धारा 13) पर हस्ताक्षर करते हैं। उनके पहचान-पत्र साथ रखें।
- क्या 30 दिन का नोटिस सार्वजनिक होता है?
- अधिनियम विवाह अधिकारी के कार्यालय में प्रकाशन का प्रावधान करता है। सफ़िया सुल्ताना (इलाहाबाद HC, 2021) में न्यायालय ने कहा कि प्रकाशन निदेशात्मक है और उ.प्र. में जोड़े लिखित में प्रकाशन न करने का अनुरोध कर सकते हैं। अन्य जगह प्रथा अलग हो सकती है — विवाह अधिकारी से पूछें।
- कोर्ट मैरिज की न्यूनतम आयु क्या है?
- विशेष विवाह अधिनियम की धारा 4 में पुरुष 21 वर्ष और महिला 18 वर्ष, कोई जीवित जीवनसाथी नहीं और वैध सहमति।
- क्या अधिवक्ता कोर्ट मैरिज करवाता है?
- नहीं। हम अपॉइंटमेंट बुक नहीं करते, गवाह की व्यवस्था नहीं करते, न विवाह अधिकारी के सामने पेश होते हैं। केवल शैक्षिक मार्गदर्शन।
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