Skip to content
Adhiwakta logo — scales of justice in a shield cradled by a handAdhiwakta
Ask

This guide is written in Hindi. Read it in English →

दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (धारा 9 हिंदू विवाह अधिनियम) — याचिका, ‘उचित कारण’, भरण-पोषण, 1 वर्ष बाद तलाक (2026)

दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना (Restitution of Conjugal Rights — RCR) याचिका का सादा परिचय — जब एक जीवनसाथी बिना उचित कारण दूसरे को छोड़ दे, तो दूसरा हिंदू विवाह अधिनियम, 1955 की धारा 9 (और अन्य विवाह कानूनों के समान प्रावधानों) में पारिवारिक न्यायालय से साथ रहने का आदेश माँग सकता है। कौन और कहाँ दाखिल कर सकता है, उचित कारण साबित करने का भार, डिक्री क्या कर सकती है और क्या नहीं, सर्वोच्च न्यायालय के 2025 के निर्णय के बाद भरण-पोषण पर असर, और पालन न होने के एक वर्ष बाद तलाक। केवल शैक्षिक — कानूनी सलाह नहीं; अधिवक्ता पारिवारिक याचिकाएँ दाखिल नहीं करता।

Send your question on WhatsApp

WhatsApp opens with your question already written. You just tap send.

धारा 9 क्या कहती है

जब पति या पत्नी में से किसी ने बिना उचित कारण दूसरे का साथ छोड़ दिया हो, तो पीड़ित जीवनसाथी ज़िला / पारिवारिक न्यायालय में दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना की याचिका दे सकता है। अदालत संतुष्ट हो कि याचिका के कथन सही हैं और इनकार का कोई कानूनी आधार नहीं, तो वह पुनर्स्थापना की डिक्री दे सकती है। धारा 9 के स्पष्टीकरण के अनुसार साथ छोड़ना दिखा दिए जाने पर उचित कारण साबित करने का भार साथ छोड़ने वाले पर है। ऐसे ही उपाय विशेष विवाह अधिनियम, 1954 की धारा 22, तलाक अधिनियम, 1869 की धारा 32 (ईसाई विवाह) और पारसी विवाह और तलाक अधिनियम, 1936 की धारा 36 में हैं; मुस्लिम विवाहों में अदालतों ने व्यक्तिगत कानून के तहत ऐसे वाद सुने हैं।

‘उचित कारण’ क्या माना जाता है

अदालत तथ्यों पर तय करती है। क्रूरता, घरेलू हिंसा, दहेज की माँग, दूसरे जीवनसाथी का व्यभिचार, या ऐसा आचरण जिससे साथ रहना असुरक्षित या असंभव हो — ऐसी स्थितियाँ उचित कारण मानी गई हैं; न्यायिक पृथक्करण या तलाक के आधार भी हो सकते हैं। उत्पीड़न से बचने के लिए घर छोड़ने वाला जीवनसाथी आमतौर पर सबूतों (शिकायतें, मेडिकल रिकॉर्ड, संदेश) के साथ लिखित जवाब में यह बताता है। ऐसे कारणों के बिना केवल अलग रहने की इच्छा कमज़ोर आधार है।

Is your situation a little different? Send your question on WhatsApp.

Write in Hindi or English · general guidance, not legal advice

Ask on WhatsApp

याचिका कहाँ और कैसे दाखिल होती है

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 19 के अनुसार याचिका उस अदालत (जहाँ हो वहाँ पारिवारिक न्यायालय) में दाखिल हो सकती है जिसकी सीमा में विवाह हुआ, प्रतिवादी रहता है, दोनों अंतिम बार साथ रहे, या — जब पत्नी याचिकाकर्ता हो — जहाँ वह रहती है। याचिका में विवाह का विवरण, साथ छोड़ने की तारीख़ और परिस्थितियाँ, और यह कि कोई मिलीभगत या अनावश्यक देरी नहीं है, लिखा जाता है। अदालत को पहले सुलह का प्रयास करना होता है (धारा 23(2); पारिवारिक न्यायालय काउंसलिंग / मध्यस्थता में भी भेजते हैं)।

डिक्री क्या कर सकती है और क्या नहीं

डिक्री किसी जीवनसाथी को शारीरिक रूप से लौटने या संबंध के लिए मजबूर नहीं कर सकती। सिविल प्रक्रिया संहिता के आदेश XXI नियम 32 के अनुसार जानबूझकर अवहेलना की गई RCR डिक्री संपत्ति की कुर्की से लागू की जा सकती है, गिरफ़्तारी या हिरासत से नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने सरोज रानी बनाम सुदर्शन कुमार चड्ढा (1984) में धारा 9 को वैध माना; इसकी संवैधानिकता को नई चुनौती सर्वोच्च न्यायालय में लंबित रही है। RCR को विवाह की स्थिति से जुड़ा कदम समझें, किसी को मजबूर करने का साधन नहीं।

पालन न होने के एक वर्ष बाद तलाक

हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13(1A)(ii) के अनुसार डिक्री के बाद एक वर्ष या अधिक तक दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना न हो तो कोई भी पक्ष — जिसके विरुद्ध डिक्री हुई वह भी — तलाक माँग सकता है। अदालत फिर भी देखती है कि याचिकाकर्ता अपनी ही गलती का लाभ तो नहीं ले रहा (धारा 23(1)(a))। इसलिए बहुत से लोग RCR को बाद के तलाक से जुड़ा मानते हैं, और अदालतें ध्यान से देखती हैं कि याचिका वास्तविक है या नहीं।

भरण-पोषण पर असर — सर्वोच्च न्यायालय 2025

CrPC धारा 125(4) (अब BNSS धारा 144(4)) के अनुसार जो पत्नी बिना पर्याप्त कारण पति के साथ रहने से मना करे, वह भरण-पोषण की हक़दार नहीं। रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो (10 जनवरी 2025) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि पति द्वारा प्राप्त पुनर्स्थापना डिक्री और पत्नी का उसका पालन न करना अपने-आप में उसे भरण-पोषण से वंचित नहीं करता; अदालत को सबूतों पर तय करना होगा कि क्या उसके पास अलग रहने का वैध और पर्याप्त कारण अब भी था। हिंदू दत्तक और भरण-पोषण अधिनियम, HMA धारा 24–25 और घरेलू हिंसा अधिनियम के दावे अपनी शर्तों पर चलते हैं।

अगर आपको RCR नोटिस या याचिका मिली है

अदालत के समन को अनदेखा न करें — पेश न होने पर एकपक्षीय डिक्री हो सकती है। विवाह के कागज़, आपने घर क्यों छोड़ा या क्यों निकाला गया इसका तारीख़वार विवरण, पुलिस या महिला प्रकोष्ठ की शिकायतें, मेडिकल रिकॉर्ड और संदेश इकट्ठा करें। देखें कि आपके समानांतर दावे (भरण-पोषण, घरेलू हिंसा से संरक्षण, स्त्रीधन वापसी) क्या हैं और हर एक की समय-सीमा क्या है। अक्सर पहले मध्यस्थता होती है; आप अपने अधिकार छोड़े बिना उसमें भाग ले सकते हैं।

कौन से कागज़ इकट्ठा करें

विवाह प्रमाणपत्र या विवाह का प्रमाण (फ़ोटो, निमंत्रण, पंजीकरण); ससुराल / वैवाहिक घर और वर्तमान निवास के पते के प्रमाण; अलगाव का तारीख़वार विवरण; लौटने को कहने वाले (या मना करने वाले) पत्र, WhatsApp संदेश या कानूनी नोटिस; पुलिस, महिला थाना या घरेलू हिंसा की शिकायतें; और बच्चों व उनकी पढ़ाई का विवरण।

यह गाइड क्या नहीं है

यह RCR याचिका दाखिल करने या विरोध करने की सलाह नहीं, परिणाम की भविष्यवाणी नहीं, और आपके धर्म व राज्य पर लागू वर्तमान कानून और निर्णयों को पढ़ने का विकल्प नहीं।

अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है

हम पारिवारिक न्यायालय की याचिका दाखिल या उसका बचाव नहीं करते, न आपके जीवनसाथी या परिवार से संपर्क करते हैं। अधिवक्ता (Adhiwakta) एक सुविधा मंच है, लॉ फ़र्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने पेश नहीं होते और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। अपनी स्थिति बताकर स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ का उपयोग करें, या तथ्य और कागज़ व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दांपत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना क्या है?
यह हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 9 (और समान कानूनों) में उस जीवनसाथी की याचिका है जिसका साथी बिना उचित कारण साथ छोड़ गया हो, जिसमें अदालत से साथ रहने की डिक्री माँगी जाती है।
क्या अदालत मेरे जीवनसाथी को ज़बरदस्ती वापस ला सकती है?
शारीरिक बल का उपयोग नहीं होता। जानबूझकर अवहेलना की गई डिक्री केवल संपत्ति की कुर्की से लागू हो सकती है (आदेश XXI नियम 32 CPC)। डिक्री के बाद एक वर्ष तक पालन न होना धारा 13(1A)(ii) में तलाक का आधार बन सकता है।
RCR डिक्री न मानने पर क्या पत्नी का भरण-पोषण ख़त्म हो जाता है?
अपने-आप नहीं। रीना कुमारी बनाम दिनेश कुमार महतो (2025) में सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि अदालत को सबूतों पर तय करना होगा कि अलग रहने का पर्याप्त कारण था या नहीं।
धारा 9 की याचिका कहाँ दाखिल होती है?
पारिवारिक / ज़िला न्यायालय में — जहाँ विवाह हुआ, जहाँ प्रतिवादी रहता है, जहाँ दोनों अंतिम बार साथ रहे, या पत्नी याचिकाकर्ता हो तो जहाँ वह रहती है (धारा 19)।
क्या अधिवक्ता पारिवारिक केस दाखिल करता है?
नहीं। हम याचिका दाखिल या उसका बचाव नहीं करते। केवल शैक्षिक मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ या AI सहायक का उपयोग करें।

Share Adhiwakta with someone who needs it

Send this page on WhatsApp — legal information in Hindi & English.

Ask on WhatsAppForm