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मारपीट, चोट और धमकी का केस भारत — BNS धारा 115 (पुरानी IPC 323), 117 (325), 118 (324), 351 (506), 352 (504): FIR, NCR, मेडिकल, जमानत (2026)

जिसके साथ मारपीट हुई हो, चोट लगी हो या धमकी मिली हो — या झगड़े के बाद जिस पर आरोप लगा हो — उसके लिए सादा नक्शा: भारतीय न्याय संहिता, 2023 में साधारण चोट, गंभीर चोट, हथियार से चोट, सदोष अवरोध, आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान का अर्थ (साथ में पुरानी IPC 323 / 324 / 325 / 341 / 504 / 506 संख्याएँ जो लोग अब भी खोजते हैं), किसमें पुलिस FIR दर्ज करती है और किसमें NCR बनकर मजिस्ट्रेट के पास जाना होता है, मेडिकल जाँच क्यों ज़रूरी है, क्रॉस-केस, समझौता, और आरोपी के पहले कदम। केवल शैक्षिक — कानूनी सलाह नहीं; अधिवक्ता FIR, शिकायत या जमानत अर्ज़ी दाखिल नहीं करता।

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पहले — सुरक्षा और इलाज

चोट लगी है तो पहले इलाज कराएँ और डॉक्टर को बताएँ कि चोट कैसे लगी; मारपीट के मामलों में अस्पताल मेडिको-लीगल रिकॉर्ड (MLC) बनाता है और चोट की रिपोर्ट बाद में सबसे अहम सबूत बनती है। आपात स्थिति में 112 पर कॉल करें। चोटों और फटे कपड़ों की फ़ोटो लें, पर्चे और X-ray / CT रिपोर्ट सँभालें, और घटना देखने वालों के नाम लिख लें। घटना से जुड़ी कोई चीज़ धोएँ या फेंकें नहीं।

कौन सी धारा — पुरानी IPC से नई BNS

स्वेच्छा से चोट पहुँचाना: BNS धारा 115(2) (पुरानी IPC 323) — 1 वर्ष तक, या ₹10,000 तक जुर्माना, या दोनों। गंभीर चोट: धारा 117(2) (पुरानी 325) — 7 वर्ष तक और जुर्माना। ख़तरनाक हथियार या साधन से चोट: धारा 118(1) (पुरानी 324) — 3 वर्ष तक, या ₹20,000 तक जुर्माना, या दोनों; ख़तरनाक हथियार से गंभीर चोट: 118(2) (पुरानी 326)। सदोष अवरोध (रास्ता रोकना): 126(2) (पुरानी 341); सदोष परिरोध (बंद रखना): 127 (पुरानी 342)। हमला या आपराधिक बल: 131 (पुरानी 352)। आपराधिक धमकी: 351(2) (पुरानी 506) — 2 वर्ष तक; जान से मारने या गंभीर चोट की धमकी: 351(3) — 7 वर्ष तक। शांति भंग के लिए जानबूझकर अपमान: 352 (पुरानी 504) — 2 वर्ष तक। गंभीर चोट (धारा 116, पुरानी 320) में हड्डी टूटना, आँख या कान की शक्ति जाना, सिर या चेहरे का स्थायी विरूपण, और ऐसी चोट शामिल है जिससे 15 दिन तक तेज़ दर्द रहे या व्यक्ति सामान्य काम न कर सके (BNS ने इसे 20 से घटाकर 15 दिन किया)।

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FIR या NCR — संज्ञेय बनाम असंज्ञेय

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की प्रथम अनुसूची के अनुसार: साधारण चोट 115(2), हमला 131, धमकी 351(2) और 351(3), तथा अपमान 352 असंज्ञेय और जमानतीय हैं; गंभीर चोट 117(2) और सदोष अवरोध 126(2) संज्ञेय और जमानतीय हैं; हथियार से चोट 118(1) संज्ञेय और अजमानतीय है। संज्ञेय अपराध में पुलिस को BNSS धारा 173 (पुरानी CrPC 154) में FIR दर्ज करनी होती है। केवल असंज्ञेय अपराध बनते हों तो पुलिस सूचना रजिस्टर में दर्ज कर आपको मजिस्ट्रेट के पास भेजती है (धारा 174, पुरानी 155) — यही ‘NCR’ है; जाँच के लिए मजिस्ट्रेट का आदेश चाहिए। अंततः कौन सी धाराएँ लगेंगी यह मेडिकल राय और तथ्यों पर निर्भर है, इसलिए चोट की रिपोर्ट अहम है।

शिकायत कैसे दें

जहाँ घटना हुई उस क्षेत्र के थाने में लिखित, हस्ताक्षरित शिकायत दें (ज़ीरो FIR किसी भी थाने में; जहाँ राज्य अनुमति दे वहाँ e-FIR)। तारीख, समय, जगह, किसने क्या किया (हर व्यक्ति अलग-अलग), हथियार या वस्तु, चोटें, धमकी के शब्द (सटीक शब्द मदद करते हैं), गवाह, और CCTV या वीडियो है या नहीं — लिखें। FIR की मुफ़्त प्रति (धारा 173(2)) या NCR की प्रति / नंबर माँगें। थाने की प्राप्ति-मुहर लगी अपनी शिकायत की प्रति रखें।

पुलिस कार्रवाई न करे तो

संज्ञेय अपराध दर्ज न हो तो शिकायत लिखित (और डाक से) BNSS धारा 173(4) (पुरानी CrPC 154(3)) में पुलिस अधीक्षक (SP) को भेजें। उसके बाद मजिस्ट्रेट के पास धारा 175(3) (पुरानी 156(3)) में जाँच के निर्देश के लिए आवेदन, या धारा 223 (पुरानी 200) में परिवाद दायर किया जा सकता है। केवल NCR वाले मामले में मजिस्ट्रेट का रास्ता ही सामान्य है। हर पत्र का प्रमाण रखें।

क्रॉस-केस और आत्मरक्षा

झगड़े के बाद अक्सर दोनों पक्ष एक-दूसरे पर शिकायत करते हैं। अदालत देखती है कि शुरुआत किसने की, दोनों तरफ़ की चोटें, मेडिकल का समय और स्वतंत्र गवाह। कानून शरीर और संपत्ति की निजी प्रतिरक्षा का अधिकार सीमाओं के साथ मान्य करता है (BNS धारा 34–44, पुरानी IPC 96–106) — बल अनुपात में और ज़रूरत से ज़्यादा नहीं होना चाहिए। तथ्य ईमानदारी से बताएँ; बढ़ा-चढ़ाकर या झूठी शिकायत पर ख़ुद कार्रवाई हो सकती है।

समझौता और शमन (compounding)

बहुत से मारपीट और धमकी के मामले पड़ोसियों, रिश्तेदारों या सहकर्मियों के बीच होते हैं और समझौते पर ख़त्म होते हैं। BNSS धारा 359 (पुरानी CrPC 320) में इनमें से कई अपराध — साधारण चोट, सदोष अवरोध, आपराधिक धमकी और जानबूझकर अपमान सहित — पीड़ित व्यक्ति द्वारा शमनीय बताए गए हैं; कुछ में अदालत की अनुमति चाहिए। गंभीर, अशमनीय अपराधों में भी समझौते के आधार पर तथ्यों के अनुसार उच्च न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्ति (BNSS धारा 528, पुरानी 482) में विचार कर सकता है। दबाव में समझौते पर हस्ताक्षर न करें और शर्तें लिखित रखें।

अगर आप आरोपी हैं

इनमें से ज़्यादातर धाराएँ जमानतीय हैं — जमानत अधिकार है, और पुलिस आमतौर पर थाने पर या अदालत पहली पेशी पर दे देती है। 118(1) या 118(2) जैसी अजमानतीय धाराओं में लोग अक्सर BNSS धारा 482 (पुरानी CrPC 438) में अग्रिम जमानत पर विचार करते हैं। BNSS धारा 35(3) (पुरानी CrPC 41A) का हाज़िरी नोटिस मिले तो पालन करें और प्रतियाँ रखें। शिकायतकर्ता या गवाहों से संपर्क, धमकी या दबाव न डालें — इससे नए आरोप और जमानत रद्द हो सकती है।

कौन से सबूत रखें

मेडिकल कागज़ और चोट रिपोर्ट; तारीख़ वाली फ़ोटो; CCTV या मोबाइल वीडियो (मूल फ़ाइल और डिवाइस सुरक्षित रखें); धमकी वाले WhatsApp संदेश, वॉइस नोट या कॉल रिकॉर्ड; गवाहों के नाम और फ़ोन नंबर; और तारीख़वार छोटा नोट। इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 2023 की धारा 63 (पुरानी साक्ष्य अधिनियम 65B) का प्रमाणपत्र माँग सकती है।

यह गाइड क्या नहीं है

यह इस बात की भविष्यवाणी नहीं कि आपके मामले में कौन सी धाराएँ लगेंगी, FIR, गिरफ़्तारी, जमानत या सज़ा की गारंटी नहीं, और समझौते की शर्तों पर सलाह नहीं। कुछ राज्यों ने कुछ अपराधों के वर्गीकरण में बदलाव अधिसूचित किए हैं — स्थानीय स्थिति जाँचें।

अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है

हम FIR, शिकायत या जमानत अर्ज़ी दाखिल नहीं करते, न आपकी ओर से पुलिस से बात करते हैं। अधिवक्ता (Adhiwakta) एक सुविधा मंच है, लॉ फ़र्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने पेश नहीं होते और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। अपनी स्थिति बताकर स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ का उपयोग करें, या तथ्य और कागज़ व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

IPC 323, 324, 325, 504 और 506 की नई धारा क्या है?
भारतीय न्याय संहिता, 2023 में: IPC 323 (चोट) = BNS 115(2); 324 (हथियार से चोट) = 118(1); 325 (गंभीर चोट) = 117(2); 504 (जानबूझकर अपमान) = 352; 506 (आपराधिक धमकी) = 351(2), और जान से मारने या गंभीर चोट की धमकी = 351(3)।
क्या साधारण मारपीट में पुलिस FIR दर्ज करेगी?
साधारण चोट (115(2)), हमला (131), धमकी (351) और अपमान (352) असंज्ञेय हैं, इसलिए पुलिस आमतौर पर NCR लिखकर मजिस्ट्रेट के पास भेजती है। गंभीर चोट (117(2)), हथियार से चोट (118) और सदोष अवरोध (126(2)) संज्ञेय हैं और इनमें FIR होती है। अक्सर मेडिकल रिपोर्ट तय करती है कि कौन सी धारा लगेगी।
क्या IPC 506 / BNS 351 जमानतीय है?
BNSS की प्रथम अनुसूची में 351(2) और 351(3) दोनों असंज्ञेय और जमानतीय हैं। देखें कि आपके राज्य ने कोई बदलाव अधिसूचित किया है या नहीं और कोई अन्य अजमानतीय धारा भी लगी है या नहीं।
क्या मारपीट का केस समझौते से ख़त्म हो सकता है?
साधारण चोट, सदोष अवरोध, धमकी और अपमान जैसे कई अपराध BNSS धारा 359 में पीड़ित द्वारा शमनीय हैं (कुछ में अदालत की अनुमति चाहिए)। समझौता स्वेच्छा से और लिखित होना चाहिए।
क्या अधिवक्ता पुलिस शिकायत दाखिल करता है?
नहीं। हम FIR, शिकायत या जमानत अर्ज़ी दाखिल नहीं करते। केवल शैक्षिक मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ या AI सहायक का उपयोग करें।

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