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पुलिस FIR नहीं लिख रही तो क्या करें — ज़ीरो FIR, SP शिकायत, धारा 175(3) BNSS

भारत में थाना FIR न लिखे तो क्या करें: धारा 173 BNSS (पुरानी धारा 154 CrPC) के तहत आपका अधिकार, ज़ीरो FIR और e-FIR, धारा 173(4) (पुरानी 154(3)) के तहत पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखित शिकायत, और धारा 175(3) (पुरानी 156(3)) के तहत मजिस्ट्रेट को आवेदन। केवल शैक्षिक जानकारी — कानूनी सलाह नहीं।

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आपका मूल अधिकार: संज्ञेय अपराध में FIR

अगर आपकी जानकारी से संज्ञेय अपराध (जैसे चोरी, मारपीट से चोट, धोखाधड़ी, यौन अपराध — जिनमें पुलिस बिना वारंट गिरफ़्तार कर सकती है) बनता है, तो पुलिस को FIR दर्ज करनी ही होगी — सुप्रीम कोर्ट की संविधान पीठ, ललिता कुमारी बनाम उत्तर प्रदेश सरकार (2013)। 1 जुलाई 2024 से यह कर्तव्य भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 173(1) में है, जिसने CrPC की धारा 154 की जगह ली। FIR की प्रति मुफ़्त मिलती है (धारा 173(2))। अपवाद: 3 साल या अधिक पर 7 साल से कम सज़ा वाले अपराधों में DSP की अनुमति से 14 दिन तक प्रारंभिक जाँच हो सकती है (धारा 173(3))। असंज्ञेय मामलों में पुलिस रजिस्टर में दर्ज कर मजिस्ट्रेट के पास भेजती है (धारा 174, पुरानी 155)।

कदम 1 — लिखित शिकायत दें और सबूत रखें

तारीख, जगह, नाम और घटना लिखकर हस्ताक्षरित शिकायत दें। अपनी प्रति पर मुहर लगी पावती माँगें, अधिकारी का नाम और समय नोट करें। थाना मना करे तो वही शिकायत थाना प्रभारी (SHO) को स्पीड पोस्ट / रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजें और रसीद व ट्रैकिंग रखें। कई राज्यों में राज्य पुलिस / CCTNS नागरिक पोर्टल पर ऑनलाइन शिकायत होती है — पावती नंबर सहेजें। आपात स्थिति में पहले 112 पर कॉल करें।

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ज़ीरो FIR और e-FIR — किसी भी थाने में, ऑनलाइन भी

धारा 173(1) BNSS के तहत संज्ञेय अपराध की सूचना किसी भी थाने में दी जा सकती है, अपराध कहीं भी हुआ हो — यही ‘ज़ीरो FIR’ है। थाना इसे दर्ज कर क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजता है। इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी सूचना (e-FIR) दी जा सकती है; तीन दिन के भीतर आपके हस्ताक्षर करने पर वह रिकॉर्ड में ली जाती है। महिलाओं के विरुद्ध कुछ अपराधों में बयान महिला पुलिस अधिकारी दर्ज करती है, और अस्थायी या स्थायी रूप से दिव्यांग महिला का बयान उसके घर या सुविधाजनक स्थान पर दर्ज हो सकता है।

कदम 2 — पुलिस अधीक्षक (SP) को लिखें (धारा 173(4), पुरानी 154(3))

थाना फिर भी मना करे तो अपनी सूचना का सार लिखकर डाक से पुलिस अधीक्षक को भेजें (कमिश्नरेट शहरों में DCP / कमिश्नर)। संज्ञेय अपराध बनता दिखे तो SP स्वयं जाँच करेंगे या अधीनस्थ अधिकारी से करवाएँगे। पुरानी शिकायत की प्रति और मना करने का सबूत लगाएँ, स्पीड पोस्ट / रजिस्टर्ड पोस्ट से भेजें और ट्रैकिंग रखें। BNSS में यह कदम अगले कदम की पूर्व-शर्त है।

कदम 3 — मजिस्ट्रेट को आवेदन (धारा 175(3), पुरानी 156(3))

SP भी कार्रवाई न करें तो क्षेत्राधिकार वाले मजिस्ट्रेट से जाँच का आदेश माँग सकते हैं। BNSS में आवेदन के साथ शपथपत्र ज़रूरी है और यह दिखाना चाहिए कि आपने धारा 173(4) के तहत SP से संपर्क किया; मजिस्ट्रेट जाँच कर सकते हैं और आदेश से पहले पुलिस अधिकारी का पक्ष सुनते हैं (सुप्रीम कोर्ट, ओम प्रकाश अंबाडकर बनाम महाराष्ट्र राज्य, 2025)। दूसरा रास्ता: धारा 223 BNSS (पुरानी धारा 200 CrPC) के तहत मजिस्ट्रेट के समक्ष परिवाद (कंप्लेंट केस)। अधिवक्ता सही रास्ता चुनने में मदद कर सकते हैं।

जब FIR न लिखना खुद अपराध है

बलात्कार व अन्य यौन अपराध, एसिड अटैक, मानव तस्करी जैसे कुछ गंभीर अपराधों की सूचना दर्ज न करने वाला पुलिस अधिकारी भारतीय न्याय संहिता की धारा 199(c) (पुरानी धारा 166A(c) IPC) के तहत अपराध करता है — 6 महीने से 2 साल तक कठोर कारावास और जुर्माना। वरिष्ठ अधिकारियों, राज्य मानवाधिकार आयोग या जहाँ कार्यरत हो वहाँ पुलिस शिकायत प्राधिकरण से भी शिकायत कर सकते हैं।

शिकायत में क्या लिखें

तारीखवार तथ्य; सही जगह और समय; आरोपियों के नाम या पहचान; गवाह; चोट और मेडिकल कागज़; दस्तावेज़, स्क्रीनशॉट या बैंक रिकॉर्ड; और आपको क्या नुकसान हुआ। धाराएँ लिखना ज़रूरी नहीं — यह पुलिस का काम है। केवल सच लिखें: पुलिस को झूठी सूचना देना भी अपराध है।

FIR दर्ज होने के बाद

FIR नंबर और प्रति संभालें। धारा 193(3) BNSS के तहत पुलिस को 90 दिन के भीतर सूचनादाता या पीड़ित को जाँच की प्रगति बतानी होती है, इलेक्ट्रॉनिक माध्यम से भी। देरी की चिंता हो तो SHO/SP को लिखित याद-पत्र भेजकर रिकॉर्ड बनाएँ।

अधिवक्ता (Adhiwakta) कैसे मदद कर सकता है

अधिवक्ता एक सुविधा मंच है, लॉ फर्म नहीं। हम FIR दर्ज नहीं करते, थानों पर दबाव नहीं डालते और किसी परिणाम की गारंटी नहीं देते। स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ का उपयोग करें, या तथ्य व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पुलिस FIR लिखने से मना कर सकती है?
संज्ञेय अपराध की सूचना पर FIR दर्ज करना अनिवार्य है (ललिता कुमारी, 2013; धारा 173 BNSS)। केवल 3 से 7 साल से कम सज़ा वाले अपराधों में DSP की अनुमति से 14 दिन तक प्रारंभिक जाँच हो सकती है।
ज़ीरो FIR क्या है?
किसी भी थाने में दर्ज FIR, अपराध चाहे कहीं भी हुआ हो। धारा 173(1) BNSS इसकी अनुमति देती है; थाना इसे क्षेत्राधिकार वाले थाने को भेजता है।
SP भी कार्रवाई न करें तो?
धारा 175(3) BNSS (पुरानी 156(3) CrPC) के तहत शपथपत्र के साथ मजिस्ट्रेट को आवेदन करें, जिसमें धारा 173(4) के तहत SP से संपर्क का सबूत हो। धारा 223 BNSS में परिवाद भी विकल्प है।

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