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भारत में पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ शिकायत कैसे करें — मारपीट या हिरासत में यातना, अवैध हिरासत, रिश्वत की माँग, धमकी, कार्रवाई से इनकार; SP / पुलिस आयुक्त को शिकायत, पुलिस शिकायत प्राधिकरण (प्रकाश सिंह 2006), BNSS धारा 175(3)–(4) में मजिस्ट्रेट (2026 का सुप्रीम कोर्ट फ़ैसला), मानवाधिकार आयोग, CCTV फ़ुटेज (परमवीर सिंह सैनी) और BNSS धारा 218 में अभियोजन स्वीकृति (2026)
उन लोगों के लिए व्यावहारिक गाइड जिन्होंने पुलिस का दुर्व्यवहार झेला है — मारपीट, अवैध हिरासत, धमकी, रिश्वत की माँग, समझौते का दबाव, या BNSS के सुरक्षा उपाय माने बिना गिरफ़्तारी: दुर्व्यवहार क्या माना जाता है और BNS के कौन-से अपराध लग सकते हैं, शिकायत के रास्ते (वरिष्ठ अधिकारी, राज्य और ज़िला पुलिस शिकायत प्राधिकरण, न्यायिक मजिस्ट्रेट, राज्य मानवाधिकार आयोग / NHRC, भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो), मेडिकल रिपोर्ट और थाने के CCTV जैसे सबूत कैसे सुरक्षित रखें, और वास्तविक अपेक्षाएँ। केवल शैक्षिक — कानूनी सलाह नहीं। अधिवक्ता किसी की ओर से शिकायत दाखिल नहीं करता और पुलिस या आयोगों से संपर्क नहीं करता।
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पुलिस दुर्व्यवहार क्या माना जाता है
आम उदाहरण: हिरासत में मारपीट या यातना; क़ानून माने बिना गिरफ़्तारी या हिरासत (गिरफ़्तारी मेमो नहीं, परिवार को सूचना नहीं, 24 घंटे में मजिस्ट्रेट के सामने पेश नहीं — BNSS धारा 35, 36, 58); बिना रिकॉर्ड ‘पूछताछ’ के नाम पर थाने में रोकना; रिश्वत माँगना; धमकी, गाली-गलौज या शिकायत वापस लेने का दबाव; संज्ञेय अपराध की FIR दर्ज करने से इनकार (पुलिस FIR न लिखे वाली गाइड देखें); संपत्ति की अवैध ज़ब्ती; और यौन उत्पीड़न। कुछ कृत्य भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत अपराध हैं — जैसे इक़बालिया बयान ऐंठने के लिए स्वेच्छा से चोट पहुँचाना (धारा 120, पुरानी IPC 330 / 331), सदोष परिरोध (धारा 127), उद्दापन / वसूली (धारा 308), और लोक सेवक का चोट पहुँचाने के लिए क़ानून की अवज्ञा करना या सूचना दर्ज न करना (धारा 198–199, पुरानी 166 / 166A)। रिश्वत की माँग भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत आती है।
पहले, ख़ुद को और सबूतों को सुरक्षित करें
चोट लगी हो तो जल्द से जल्द सरकारी अस्पताल में मेडिकल जाँच और इलाज कराएँ और MLC / चोट रिपोर्ट व तस्वीरें रखें। तारीख़, समय, जगह, नाम, बैज नंबर, गाड़ी नंबर और गवाहों के नाम लिख लें। परमवीर सिंह सैनी बनाम बलजीत सिंह (2 दिसंबर 2020) में सुप्रीम कोर्ट ने हर थाने में ऑडियो सहित CCTV कैमरे लगाने का निर्देश दिया, जो प्रवेश-निकास, लॉक-अप और गलियारों को कवर करें, और फ़ुटेज 18 महीने, कभी भी एक साल से कम नहीं, सुरक्षित रखी जाए — इसलिए जल्दी लिखित में फ़ुटेज सुरक्षित रखने की माँग करें और हर शिकायत में इसका उल्लेख करें। पैसे माँगने वाली कॉल रिकॉर्डिंग या संदेशों की प्रतियाँ रखें।
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वरिष्ठ पुलिस अधिकारियों को शिकायत
ज़िले के पुलिस अधीक्षक (SP) / पुलिस उपायुक्त या पुलिस आयुक्त को लिखित शिकायत, रेंज IG / DIG को प्रतियों के साथ, विभागीय कार्रवाई (निलंबन, जाँच, तबादला) का सबसे तेज़ रास्ता है। अगर दुर्व्यवहार में संज्ञेय अपराध भी बनता है और थाना FIR दर्ज करने से मना करे, तो आप सूचना का सार BNSS धारा 173(4) (पुरानी CrPC 154(3)) के तहत SP को भेज सकते हैं। कई राज्यों में ऑनलाइन शिकायत पोर्टल और CM हेल्पलाइन हैं; पावती और शिकायत संख्या रखें।
पुलिस शिकायत प्राधिकरण (PCA)
प्रकाश सिंह बनाम भारत संघ (2006) में सुप्रीम कोर्ट ने हर राज्य को SP और उससे ऊपर के अधिकारियों के गंभीर दुर्व्यवहार की शिकायतें देखने के लिए राज्य पुलिस शिकायत प्राधिकरण, और DSP तक के अधिकारियों के लिए ज़िला प्राधिकरण बनाने का निर्देश दिया। ‘गंभीर दुर्व्यवहार’ में पुलिस हिरासत में मृत्यु, गंभीर चोट या बलात्कार शामिल है; ज़िला प्राधिकरण उद्दापन, ज़मीन या मकान हड़पने और अधिकार के गंभीर दुरुपयोग को भी देखता है। कई राज्यों ने अपने पुलिस अधिनियमों या आदेशों से ये प्राधिकरण बनाए हैं, जिनकी शक्तियाँ और कामकाज अलग-अलग हैं — पता और फ़ॉर्म के लिए अपने राज्य के PCA की वेबसाइट या गृह विभाग देखें।
न्यायिक मजिस्ट्रेट को शिकायत (BNSS धारा 175(3)–(4))
अगर पुलिस कार्रवाई न करे, तो आप न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने शपथ-पत्र सहित लिखित शिकायत देकर BNSS धारा 175(3) (पुरानी CrPC 156(3)) के तहत FIR और जाँच का आदेश माँग सकते हैं, या परिवाद दायर कर सकते हैं ताकि मजिस्ट्रेट स्वयं संज्ञान ले। BNSS ने धारा 175(4) जोड़ी है: सरकारी कर्तव्य के दौरान हुई घटना पर लोक सेवक के ख़िलाफ़ शिकायत में मजिस्ट्रेट अधिकारी के वरिष्ठ से रिपोर्ट लेकर और अधिकारी का पक्ष देखकर जाँच का आदेश दे सकता है। XXX बनाम केरल राज्य (27 जनवरी 2026) में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह उपधारा धारा 175(3) के साथ मिलकर काम करती है — शिकायत लिखित और शपथ-पत्र पर होनी चाहिए — और मजिस्ट्रेट को वरिष्ठ अधिकारी की रिपोर्ट का अनिश्चित काल तक इंतज़ार नहीं करना है।
अभियोजन स्वीकृति: कब ज़रूरी, कब नहीं
BNSS धारा 218 (पुरानी CrPC 197) के अनुसार लोक सेवक द्वारा ‘सरकारी कर्तव्य के निर्वहन में कार्य करते हुए या कार्य करने का दावा करते हुए’ किए गए अपराध का संज्ञान कोर्ट सरकार की पूर्व स्वीकृति के बिना नहीं ले सकता। कोर्ट ने बार-बार कहा है कि यह सुरक्षा केवल उन कृत्यों के लिए है जो सरकारी कर्तव्य से उचित रूप से जुड़े हों; यह हर अवैध कृत्य की ढाल नहीं है, और यह लागू होती है या नहीं, तथ्यों पर निर्भर है। धारा 175(4) में मजिस्ट्रेट का आदेश और संज्ञान के समय स्वीकृति का प्रश्न दो अलग चरण हैं।
हिरासत में मृत्यु, गुमशुदगी या बलात्कार
जहाँ कोई व्यक्ति पुलिस हिरासत में मर जाए या ग़ायब हो जाए, या हिरासत में किसी महिला से बलात्कार का आरोप हो, वहाँ BNSS धारा 196 (पुरानी CrPC 176(1A)) के तहत पुलिस जाँच के अलावा न्यायिक मजिस्ट्रेट (केवल कार्यपालक मजिस्ट्रेट नहीं) द्वारा जाँच ज़रूरी है, और शव को मृत्यु के 24 घंटे के भीतर पोस्टमार्टम के लिए भेजा जाना है। डी.के. बसु बनाम पश्चिम बंगाल राज्य (1997) ने गिरफ़्तारी के सुरक्षा उपाय तय किए — गिरफ़्तार करने वाले अधिकारियों की पहचान, परिवार के सदस्य या स्थानीय व्यक्ति के गवाह वाला गिरफ़्तारी मेमो, रिश्तेदार को सूचना, मेडिकल जाँच — और राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (NHRC) को हिरासत में मृत्यु की सूचना देना ज़रूरी है। परिवार अनुच्छेद 226 में हाई कोर्ट भी जा सकते हैं (रिट गाइड देखें)।
मानवाधिकार आयोग
आप मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 के तहत राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC में शिकायत कर सकते हैं — NHRC ऑनलाइन (hrcnet.nic.in) और डाक से, हिंदी और अंग्रेज़ी में शिकायतें लेता है। आयोग जाँच कर सकता है, मुआवज़े और अभियोजन की सिफ़ारिश कर सकता है, और पुलिस से रिपोर्ट माँग सकता है। सामान्यतः वह शिकायत किए गए कृत्य के एक साल बाद किसी मामले की जाँच नहीं कर सकता (धारा 36(2)), और जो मामला पहले से किसी अन्य आयोग के सामने है उसे नहीं लेता। आयोग सिफ़ारिश करता है; सज़ा नहीं देता।
रिश्वत की माँग
अगर कोई अधिकारी FIR दर्ज करने, किसी व्यक्ति या गाड़ी को छोड़ने, या केस ‘निपटाने’ के लिए पैसे माँगे, तो भुगतान न करें। राज्य के भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो / सतर्कता विभाग में, या केंद्रीय पुलिस संगठनों के लिए CBI में शिकायत करें। एजेंसियाँ भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम, 1988 के तहत ट्रैप की व्यवस्था कर सकती हैं; कोई भी रिकॉर्डिंग या संदेश सबूत के रूप में रखें।
वास्तविक अपेक्षाएँ
विभागीय कार्रवाई, आपराधिक मुक़दमा और मुआवज़ा अलग-अलग रास्ते हैं और समय ले सकते हैं। बदले की कार्रवाई का डर वास्तविक है — शिकायत में किसी भी धमकी का उल्लेख करें और सुरक्षा माँगें; गवाह संरक्षण योजना, 2018 और कोर्ट सुरक्षा का निर्देश दे सकते हैं। शिकायत में बढ़ा-चढ़ाकर न लिखें; तथ्यों और दस्तावेज़ों पर टिके रहें। पात्र व्यक्ति ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण (DLSA) से सरकारी विधिक सहायता ले सकते हैं।
अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है
हम शिकायत या याचिका दाखिल नहीं करते, पुलिस, आयोगों या कोर्ट से संपर्क नहीं करते, और कहीं पेश नहीं होते। अधिवक्ता एक सुविधा प्लेटफ़ॉर्म है, लॉ फर्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने उपस्थित नहीं होते, और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ का उपयोग करें, या तथ्यों और कागज़ात व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- पुलिस अधिकारी के ख़िलाफ़ शिकायत कहाँ करें?
- SP / पुलिस आयुक्त और वरिष्ठ अधिकारियों को, जहाँ हो वहाँ राज्य या ज़िला पुलिस शिकायत प्राधिकरण को, न्यायिक मजिस्ट्रेट को, राज्य मानवाधिकार आयोग या NHRC को, और रिश्वत की माँग पर भ्रष्टाचार निरोधक ब्यूरो को। आप एक से ज़्यादा रास्ते अपना सकते हैं।
- पुलिस शिकायत प्राधिकरण क्या है?
- एक स्वतंत्र संस्था जिसे बनाने का निर्देश सुप्रीम कोर्ट ने प्रकाश सिंह (2006) में राज्यों को दिया: SP और उससे ऊपर के अधिकारियों के गंभीर दुर्व्यवहार के लिए राज्य प्राधिकरण, और DSP तक के अधिकारियों के लिए ज़िला प्राधिकरण। शक्तियाँ और कामकाज राज्य के अनुसार अलग हैं।
- क्या मुझे थाने की CCTV फ़ुटेज मिल सकती है?
- परमवीर सिंह सैनी (2020) के अनुसार थानों में ऑडियो सहित CCTV ज़रूरी है और फ़ुटेज 18 महीने, कम से कम एक साल, सुरक्षित रखनी है। जल्दी लिखित में सुरक्षित रखने की माँग करें, शिकायतों में उल्लेख करें, और मजिस्ट्रेट या आयोग से उसे मँगवाने का अनुरोध करें।
- क्या पुलिसकर्मी पर मुक़दमे के लिए स्वीकृति ज़रूरी है?
- BNSS धारा 218 (पुरानी CrPC 197) में स्वीकृति केवल सरकारी कर्तव्य में कार्य करते हुए या ऐसा दावा करते हुए किए गए कृत्यों के लिए ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा है कि यह हर अवैध कृत्य को नहीं बचाती; यह तथ्यों पर निर्भर है।
- NHRC में शिकायत की समय-सीमा क्या है?
- मानवाधिकार संरक्षण अधिनियम, 1993 की धारा 36(2) के तहत आयोग सामान्यतः कृत्य की तारीख़ से एक साल बाद किसी मामले की जाँच नहीं कर सकता। शिकायत hrcnet.nic.in पर ऑनलाइन की जा सकती है।
- BNSS में लोक सेवकों के ख़िलाफ़ शिकायत में क्या बदला?
- BNSS धारा 175(4) के तहत जाँच का आदेश देने से पहले मजिस्ट्रेट अधिकारी के वरिष्ठ से रिपोर्ट लेता है और अधिकारी का पक्ष देखता है। 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि शिकायत शपथ-पत्र पर होनी चाहिए और मजिस्ट्रेट को रिपोर्ट का अनिश्चित काल तक इंतज़ार नहीं करना है।
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