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तलाक कैसे लें: आपसी सहमति और विवादित तलाक की पूरी प्रक्रिया
भारत में तलाक कैसे लें — आपसी सहमति (धारा 13B) या विवादित (धारा 13), क्रम से कदम, दस्तावेज़, ख़र्च, समय, गुज़ारा भत्ता और बच्चे। शैक्षिक जानकारी, औपचारिक सलाह नहीं।
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सीधा जवाब
भारत में तलाक केवल अदालत की डिक्री से होता है। अगर पति-पत्नी दोनों राज़ी हैं और कम से कम 1 साल से अलग रह रहे हैं, तो आपसी सहमति की संयुक्त याचिका (हिंदू विवाह अधिनियम धारा 13B) लगाएँ: पहला प्रस्ताव, फिर 6 महीने बाद दूसरा प्रस्ताव (अदालत यह इंतज़ार माफ़ कर सकती है)। इसमें आमतौर पर 6–18 महीने लगते हैं। अगर जीवनसाथी राज़ी नहीं है, तो धारा 13 के किसी कानूनी आधार (क्रूरता, 2+ साल से परित्याग, व्यभिचार आदि) पर विवादित याचिका लगाएँ; इसमें अक्सर 2–5 साल लगते हैं। याचिका उस फ़ैमिली कोर्ट में लगती है जहाँ शादी हुई, जहाँ आख़िरी बार साथ रहे, या जहाँ प्रतिवादी रहता है (पत्नी अपने निवास स्थान पर भी लगा सकती है)।
टीम अधिवक्ता · अपडेट 2026-10-26
कौन-सा तलाक आपके लिए? 4 सवाल
क्या शादी को 1 साल से ज़्यादा हो गया है?
तलाक की प्रक्रिया — क्रम से
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शादी को कम से कम 1 साल (धारा 14; असाधारण कठिनाई में ही पहले)। आपसी सहमति के लिए 1 साल से अलग रहना भी ज़रूरी।
रास्ता चुनें
तलाक, गुज़ारा भत्ता, बच्चे और संपत्ति पर दोनों सहमत: आपसी सहमति (13B)। नहीं तो: विवादित (धारा 13), ऐसे आधार पर जिसे साबित कर सकें। नीचे का चयनकर्ता देखें।
शर्तें लिखित में तय करें (आपसी)
गुज़ारा भत्ता (एकमुश्त या मासिक), स्त्रीधन वापसी, बच्चे की कस्टडी व मुलाक़ात, और दूसरे केस वापस लेना — यह सब समझौते में लिखकर याचिका के साथ लगता है।
फ़ैमिली कोर्ट में याचिका दाखिल करें
हलफ़नामों के साथ याचिका तैयार करें, दस्तावेज़ लगाएँ और कोर्ट फ़ीस दें। अदालत का चयन धारा 19 के अनुसार। कई अदालतें अब eCourts पोर्टल से ई-फ़ाइलिंग भी लेती हैं।
मध्यस्थता या काउंसलिंग
फ़ैमिली कोर्ट आमतौर पर पहले काउंसलिंग या मध्यस्थता में भेजता है। विवादित केस में प्रतिवादी को नोटिस जाता है और वह लिखित जवाब देता है।
पहला प्रस्ताव और बयान
आपसी: दोनों पेश होते हैं, बयान दर्ज होते हैं, पहले प्रस्ताव का आदेश होता है। विवादित: मुद्दे तय होते हैं, फिर सबूत और जिरह।
दूसरा प्रस्ताव या अंतिम बहस
आपसी: 6 महीने बाद और 18 महीने के भीतर दूसरा प्रस्ताव; 6 महीने की छूट के लिए आवेदन कर सकते हैं (अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर, 2017)। विवादित: अंतिम बहस।
डिक्री और प्रमाणित प्रति
अदालत तलाक की डिक्री देती है। प्रमाणित प्रति लें; दोबारा शादी, रिकॉर्ड बदलने और गुज़ारा भत्ते के लिए ज़रूरी। अपील लंबित न होने पर दोबारा शादी की जा सकती है (धारा 15)।
ज़रूरी दस्तावेज़
- विवाह प्रमाण पत्र, या शादी का कार्ड और फ़ोटो
- दोनों के पते और पहचान का प्रमाण (आधार, वोटर आईडी)
- 1 साल से अलग रहने का प्रमाण (आपसी)
- आय का प्रमाण: सैलरी स्लिप, ITR, बैंक स्टेटमेंट
- संपत्ति और देनदारियों का हलफ़नामा (रजनेश बनाम नेहा, 2020)
- गुज़ारा भत्ता, स्त्रीधन और कस्टडी की शर्तें (आपसी)
- आधार के सबूत: मैसेज, मेडिकल या पुलिस रिकॉर्ड (विवादित)
- बच्चों के जन्म प्रमाण पत्र और स्कूल का विवरण
ख़र्च और समय
- कोर्ट फ़ीस
- मामूली; आमतौर पर कुछ सौ रुपये या कम, हर राज्य अलग तय करता है
- आपसी सहमति में समय
- लगभग 6–18 महीने; 6 महीने की छूट मिले तो जल्दी
- विवादित में समय
- अक्सर 2–5 साल, अपील हो तो और
- मुख्य ख़र्च
- अधिवक्ता फ़ीस और सुनवाइयों की संख्या; शहर के अनुसार बहुत अलग
- कानूनी सहायता
- महिलाएँ और पात्र व्यक्ति ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण में आवेदन कर सकते हैं (NALSA हेल्पलाइन 15100)
कानून और स्रोत
- हिंदू विवाह अधिनियम 1955, धारा 13B — आपसी सहमति से तलाक: 1 साल अलग रहना, 6 से 18 महीने के बीच दूसरा प्रस्ताव।
- हिंदू विवाह अधिनियम 1955, धारा 13 — विवादित तलाक के आधार: क्रूरता, 2+ साल परित्याग, व्यभिचार, धर्म परिवर्तन, मानसिक विकार, संन्यास, 7 साल से लापता; पत्नी के अतिरिक्त आधार धारा 13(2) में।
- हिंदू विवाह अधिनियम, धारा 14, 19, 24, 25 — 1 साल की रोक, कहाँ याचिका लगे, केस के दौरान अंतरिम भरण-पोषण, और स्थायी गुज़ारा भत्ता।
- अमरदीप सिंह बनाम हरवीन कौर (2017), सुप्रीम कोर्ट — 6 महीने की प्रतीक्षा अवधि अनिवार्य नहीं, माफ़ हो सकती है।
- BNSS 2023, धारा 144 — पत्नी, बच्चों और माता-पिता का भरण-पोषण (पुरानी CrPC धारा 125), हर धर्म के लिए।
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गुज़ारा भत्ता और भरण-पोषण
केस के दौरान धारा 24 में अंतरिम भरण-पोषण और मुक़दमे का ख़र्च माँगा जा सकता है; डिक्री के समय धारा 25 में स्थायी गुज़ारा भत्ता। BNSS धारा 144 का रास्ता हर धर्म के लिए अलग से उपलब्ध है। दोनों पक्षों को संपत्ति और आय का हलफ़नामा देना होता है।
बच्चों की कस्टडी
कस्टडी का फ़ैसला बच्चे के हित को देखकर होता है। छोटे बच्चे अक्सर माँ के पास रहते हैं, और दूसरे माता-पिता को मुलाक़ात का अधिकार मिलता है। आपसी तलाक में यह समझौते में लिखा जाता है।
स्त्रीधन और साझा सामान
शादी में पत्नी को मिले गहने और उपहार स्त्रीधन हैं और उसी के हैं। आपसी तलाक में इनकी वापसी की सूची समझौते में लिखें।
सुरक्षा पहले
मारपीट या धमकी हो तो 112 डायल करें, और घरेलू हिंसा अधिनियम में संरक्षण आदेश अभी माँगा जा सकता है, तलाक का इंतज़ार किए बिना।
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अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न
- आपसी सहमति से तलाक में कितना समय लगता है?
- आमतौर पर 6 से 18 महीने। दूसरा प्रस्ताव पहले के कम से कम 6 महीने बाद आता है, लेकिन जब शादी साफ़ तौर पर टूट चुकी हो और शर्तें तय हों तो फ़ैमिली कोर्ट यह इंतज़ार माफ़ कर सकता है।
- जीवनसाथी राज़ी न हो तो क्या तलाक मिल सकता है?
- हाँ, हिंदू विवाह अधिनियम की धारा 13 में क्रूरता या 2+ साल परित्याग जैसे आधार पर विवादित याचिका से। आधार को सबूत से साबित करना होता है, इसलिए समय ज़्यादा लगता है।
- क्या शादी के 1 साल के भीतर तलाक हो सकता है?
- सामान्यतः नहीं। धारा 14 पहले साल में याचिका पर रोक लगाती है, जब तक अदालत असाधारण कठिनाई के कारण अनुमति न दे।
- क्या नोटरी समझौते या पंचायत से तलाक मान्य है?
- नहीं। हिंदू, सिख, जैन और बौद्ध की शादी केवल अदालत की डिक्री से ख़त्म होती है। स्टांप पेपर वाला तलाक मान्य नहीं, और उसके बाद की शादी द्विविवाह हो सकती है।
- भारत में तलाक का ख़र्च कितना है?
- कोर्ट फ़ीस मामूली है। ज़्यादातर ख़र्च अधिवक्ता फ़ीस का है, जो शहर और सुनवाइयों पर निर्भर है। आपसी सहमति विवादित केस से बहुत कम ख़र्चीली है। पात्र लोग सरकारी कानूनी सहायता माँग सकते हैं।
- क्या अदालत में ख़ुद पेश होना ज़रूरी है?
- आपसी तलाक में बयान दर्ज कराने के लिए आमतौर पर हाँ। विदेश या दूर रहने वाले जीवनसाथी को कई फ़ैमिली कोर्ट वीडियो से पेश होने देते हैं, यह अदालत के विवेक पर है।
- अगर हम हिंदू नहीं हैं तो कौन-सा कानून लागू होगा?
- कोर्ट मैरिज और अंतर-धार्मिक जोड़ों के लिए विशेष विवाह अधिनियम धारा 27/28, ईसाइयों के लिए तलाक अधिनियम 1869 (2 साल अलग रहने पर आपसी तलाक), और मुसलमानों के लिए मुस्लिम पर्सनल लॉ व 1939 का अधिनियम।
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