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18 साल से कम उम्र का बच्चा पुलिस ने पकड़ा या उस पर अपराध का आरोप? माता-पिता क्या करें — 24 घंटे में किशोर न्याय बोर्ड, हवालात नहीं, जमानत नियम है (JJ अधिनियम धारा 12), उम्र का सबूत (धारा 94), 4 महीने में जाँच, 16–18 साल जघन्य अपराध आकलन (धारा 15), रिकॉर्ड मिटना (धारा 24) (2026)

जब 18 साल से कम उम्र के बेटे या बेटी को पुलिस पकड़ ले, शिकायत या FIR में नाम आए, या थाने बुलाया जाए — माता-पिता के लिए आसान, चरण-दर-चरण गाइड: किशोर न्याय अधिनियम बच्चे की कैसे रक्षा करता है, पुलिस क्या कर सकती है और क्या नहीं, किशोर न्याय बोर्ड में जमानत कैसे मिलती है, उम्र किन काग़ज़ों से साबित होती है, जाँच में क्या होता है, और रिकॉर्ड कैसे मिटता है। केवल शैक्षिक जानकारी — कानूनी सलाह नहीं। अधिवक्ता आपके लिए जमानत आवेदन दाखिल नहीं करता और पुलिस या बोर्ड से संपर्क नहीं करता।

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पहली बात — कानून बच्चे के साथ अलग व्यवहार करता है

कथित अपराध की तारीख़ पर जिसकी उम्र 18 साल से कम थी, वह किशोर न्याय (बालकों की देखरेख और संरक्षण) अधिनियम, 2015 में ‘विधि का उल्लंघन करने वाला बालक’ है। ऐसे बच्चे पर सामान्य आपराधिक अदालत में मुक़दमा नहीं चलता और उसे जेल नहीं भेजा जाता। मामला किशोर न्याय बोर्ड (JJB) में जाता है — एक मजिस्ट्रेट और दो सामाजिक कार्यकर्ता, जिनमें कम से कम एक महिला। कानून का मक़सद सुधार और पुनर्वास है, सज़ा नहीं। अगर घटना के समय बच्चा 18 से कम था, तो यह बात पुलिस और बोर्ड को तुरंत बताएँ — भले ही बच्चा अब 18 का हो गया हो।

पुलिस को क्या करना है और क्या नहीं

पुलिस बच्चे को पकड़े तो उसे थाने के बाल कल्याण पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई के हवाले करना होता है और 24 घंटे में (यात्रा का समय छोड़कर) बोर्ड के सामने पेश करना होता है — हवालात या जेल में कभी नहीं (JJ अधिनियम धारा 10)। JJ आदर्श नियम, 2016 कहते हैं कि बच्चे को हथकड़ी, ज़ंजीर या ज़बरदस्ती नहीं की जाएगी, और पुलिस माता-पिता, परिवीक्षा अधिकारी और बोर्ड को सूचना देगी। आदर्श नियम 8 के अनुसार बच्चे के ख़िलाफ़ FIR केवल जघन्य अपराध (न्यूनतम सात साल सज़ा) या बड़ों के साथ मिलकर किए अपराध में दर्ज होती है; बाक़ी मामलों में पुलिस रोज़नामचे में दर्ज करके सामाजिक पृष्ठभूमि रिपोर्ट बोर्ड को भेजती है, और बच्चे को आम तौर पर माता-पिता के साथ हाज़िर होने को कहा जाता है। शांत रहें, बच्चे की उम्र का सबूत लेकर थाने जाएँ, और पूछें कि कौन सा अपराध बताया गया है और बच्चा बोर्ड के सामने कब पेश होगा।

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जमानत नियम है, अपवाद नहीं (JJ अधिनियम धारा 12)

अपराध ज़मानती हो या ग़ैर-ज़मानती, बच्चे को थाना प्रभारी या बोर्ड द्वारा ज़मानत पर छोड़ा जाना है — ज़मानतदार के साथ या बिना, या परिवीक्षा अधिकारी या किसी उपयुक्त व्यक्ति की देखरेख में। ज़मानत तभी मना हो सकती है जब छोड़ने से बच्चा ज्ञात अपराधियों के संपर्क में आए, उसे नैतिक, शारीरिक या मानसिक ख़तरा हो, या न्याय का उद्देश्य विफल हो — और बोर्ड को कारण लिखने होते हैं। तब भी बच्चा जेल नहीं, संप्रेक्षण गृह या सुरक्षित स्थान पर रहता है। अगर परिवार सात दिन में ज़मानत की शर्तें पूरी न कर पाए, तो बच्चे को फिर पेश किया जाता है ताकि बोर्ड शर्तें आसान करे। ज़मानत मना होने पर धारा 101 में बाल न्यायालय (सत्र न्यायालय) में अपील हो सकती है।

उम्र का सबूत — ये काग़ज़ तैयार रखें (JJ अधिनियम धारा 94)

उम्र एक तय क्रम में तय होती है: पहले स्कूल का जन्मतिथि प्रमाण पत्र या मैट्रिक / समकक्ष प्रमाण पत्र; वह न हो तो नगर निकाय या पंचायत का जन्म प्रमाण पत्र; दोनों न हों तभी हड्डी (ऑसिफ़िकेशन) या अन्य चिकित्सा जाँच, जो 15 दिन में पूरी होनी है। मूल और प्रतियाँ साथ रखें। आरोपी के बच्चा होने का दावा किसी भी अदालत में, किसी भी चरण में उठाया जा सकता है — मामला ख़त्म होने के बाद भी (धारा 9(2))। जन्म प्रमाण पत्र में ग़लती हो तो हमारी जन्म प्रमाण पत्र सुधार गाइड देखें।

बोर्ड के सामने जाँच

बोर्ड को बच्चे की पहली पेशी से चार महीने में जाँच पूरी करनी होती है, जो लिखित कारणों से दो महीने तक बढ़ सकती है (धारा 14)। छोटे अपराध (तीन साल तक सज़ा) की जाँच उसके बाद भी पूरी न हो तो कार्यवाही ख़त्म हो जाती है। बोर्ड बच्चों के अनुकूल कमरे में बैठता है — ऊँचा मंच या कटघरा नहीं। परिवीक्षा अधिकारी सामाजिक जाँच रिपोर्ट बनाता है। बच्चे को ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण से कानूनी सहायता का अधिकार है। धारा 18 में संभावित आदेश — समझाइश या चेतावनी, सामूहिक परामर्श, सामुदायिक सेवा, जुर्माना, अच्छे आचरण की परिवीक्षा पर माता-पिता को सौंपना, या तीन साल तक विशेष गृह में रहना। बच्चे को मृत्युदंड या बिना रिहाई की संभावना वाला आजीवन कारावास नहीं दिया जा सकता (धारा 21)।

बच्चा 16–18 साल का हो और अपराध जघन्य हो (धारा 15)

16 साल या उससे ऊपर के बच्चे पर जघन्य अपराध का आरोप हो, तो बोर्ड पहली पेशी से तीन महीने में प्रारंभिक आकलन करता है — बच्चे की मानसिक और शारीरिक क्षमता, परिणाम समझने की योग्यता और परिस्थितियाँ। बोर्ड मामला अपने पास रख सकता है या बाल न्यायालय भेज सकता है, जो कुछ मामलों में बच्चे पर वयस्क की तरह मुक़दमा चला सकता है। यह गंभीर चरण है: परिवार स्कूल रिकॉर्ड, चरित्र के बारे में पत्र और कोई परामर्श या चिकित्सा इतिहास जुटाए, और जल्दी किसी स्वतंत्र अधिवक्ता से बात करे।

पहचान गोपनीय और रिकॉर्ड साफ़ (धारा 74, 24)

कोई अख़बार, टीवी चैनल, सोशल मीडिया पोस्ट या रिपोर्ट बच्चे का नाम, स्कूल, पता, फ़ोटो या पहचान बताने वाली कोई बात नहीं छाप सकती — छह महीने तक जेल या ₹2 लाख जुर्माना, या दोनों (धारा 74)। मामले के बाद इस अधिनियम में निपटे बच्चे पर नौकरी या पढ़ाई की कोई अयोग्यता नहीं लगती, और दोषसिद्धि का रिकॉर्ड मिटाया जाना है (धारा 24) — सिवाय उस स्थिति के जब 16–18 साल के बच्चे पर जघन्य अपराध में वयस्क की तरह मुक़दमा चला हो। बच्चे से किसी और का लिखा ‘इक़बालिया बयान’ साइन न करवाएँ, मामले के बारे में ऑनलाइन पोस्ट न करें, और शिकायतकर्ता को धमकाएँ नहीं।

अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है

हम जमानत आवेदन दाखिल नहीं करते, बोर्ड या पुलिस के सामने उपस्थित नहीं होते, और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। अधिवक्ता एक सुविधा प्लेटफ़ॉर्म है, लॉ फर्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने उपस्थित नहीं होते, और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ पर अपनी स्थिति लिखें, या तथ्यों और काग़ज़ों को व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक जानकारी — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

क्या पुलिस मेरे 15 साल के बेटे को रात भर हवालात में रख सकती है?
नहीं। JJ अधिनियम धारा 10 में बच्चे को कभी भी हवालात या जेल में नहीं रखा जा सकता। उसे बाल कल्याण पुलिस अधिकारी या विशेष किशोर पुलिस इकाई के पास रखकर 24 घंटे में (यात्रा का समय छोड़कर) किशोर न्याय बोर्ड के सामने पेश करना होता है।
क्या नाबालिग को ग़ैर-ज़मानती अपराध में ज़मानत मिलती है?
हाँ, ज़मानत नियम है। धारा 12 में बच्चे को ज़मानतदार के साथ या बिना, या परिवीक्षा अधिकारी या उपयुक्त व्यक्ति की देखरेख में छोड़ा जाना है — जब तक छोड़ने से उसे ख़तरा न हो, वह ज्ञात अपराधियों के संपर्क में न आए या न्याय विफल न हो — और बोर्ड को कारण लिखने होते हैं।
बोर्ड के सामने बच्चे की उम्र कौन सा काग़ज़ साबित करता है?
धारा 94 में पहले स्कूल का जन्मतिथि प्रमाण पत्र या मैट्रिक प्रमाण पत्र; वह न हो तो नगर निकाय या पंचायत का जन्म प्रमाण पत्र; दोनों न हों तभी 15 दिन में पूरी होने वाली हड्डी या चिकित्सा जाँच।
क्या किशोर मामले से बच्चे की आगे की नौकरी पर असर पड़ेगा?
आम तौर पर नहीं। धारा 24 कोई अयोग्यता नहीं लगने देती और रिकॉर्ड मिटाने का प्रावधान करती है, सिवाय उस स्थिति के जब 16–18 साल के बच्चे पर जघन्य अपराध में वयस्क की तरह मुक़दमा चला हो। बच्चे की पहचान भी छापी नहीं जा सकती (धारा 74)।
क्या 17 साल के बच्चे पर वयस्क की तरह मुक़दमा चल सकता है?
केवल जघन्य अपराध (न्यूनतम सात साल सज़ा) में, और धारा 15 में बोर्ड के प्रारंभिक आकलन के बाद ही। तब भी मृत्युदंड या बिना रिहाई का आजीवन कारावास नहीं दिया जा सकता।

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