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दोस्त या रिश्तेदार को उधार दिया पैसा वापस नहीं कर रहा? भारत में उधार पैसा वापस कैसे लें — सबूत, लीगल नोटिस, 3 साल की समय-सीमा (परिसीमा अधिनियम अनुच्छेद 19), चेक बाउंस धारा 138, संक्षिप्त वाद (CPC आदेश 37), कब यह धोखाधड़ी है (BNS धारा 318) (2026)

उन लोगों के लिए सरल गाइड जिन्होंने दोस्त, रिश्तेदार, सहकर्मी या पड़ोसी को नकद, UPI या बैंक ट्रांसफ़र से उधार दिया और अब पैसा वापस नहीं मिल रहा: कौन से सबूत काम आते हैं, लिखित में कैसे माँगें, तीन साल की समय-सीमा, चेक होने पर क्या बदलता है, दीवानी वसूली के रास्ते (वसूली वाद, संक्षिप्त वाद, लोक अदालत) और पुलिस आम तौर पर इसे दीवानी मामला क्यों मानती है। केवल शैक्षिक जानकारी — कानूनी सलाह नहीं। अधिवक्ता कोई नोटिस नहीं भेजता, केस दाखिल नहीं करता और उधार लेने वाले से संपर्क नहीं करता।

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सबसे पहले समय-सीमा देखें — आम तौर पर 3 साल

परिसीमा अधिनियम, 1963 के अनुसार उधार दिए पैसे की वसूली का वाद आम तौर पर उधार देने की तारीख से तीन साल के भीतर दाखिल होना चाहिए (अनुसूची अनुच्छेद 19; माँगने पर देय उधार के लिए अनुच्छेद 21)। माँग पर देय प्रॉमिसरी नोट (रुक्का) हो तो नोट की तारीख से तीन साल (अनुच्छेद 35)। अगर समय-सीमा ख़त्म होने से पहले उधार लेने वाला लिखकर और हस्ताक्षर करके कर्ज़ स्वीकार करे (धारा 18 — रकम मानने वाला हस्ताक्षरित पत्र, संदेश या लिखा-पढ़ी) या आंशिक भुगतान करे जो लिखित में दर्ज हो (धारा 19), तो नई अवधि शुरू होती है। सालों इंतज़ार न करें — आज ही तारीखें नोट कर लें।

अपने सबूत इकट्ठा करें

बैंक या UPI स्टेटमेंट जिसमें ट्रांसफ़र दिखे (UTR नंबर सहित), प्रॉमिसरी नोट, उधार का इकरारनामा या रसीद, उधार लेने वाले के दिए चेक, WhatsApp चैट, SMS, ईमेल या कॉल रिकॉर्डिंग जिनमें वह उधार मानता हो या लौटाने का वादा करता हो, और उस समय मौजूद लोगों के नाम। नकद उधार साबित करना सबसे कठिन है — बाद की कोई भी लिखित स्वीकृति बहुत अहम हो जाती है। स्क्रीनशॉट के साथ मूल फ़ोन या चैट एक्सपोर्ट सँभालकर रखें; अदालत इलेक्ट्रॉनिक रिकॉर्ड के लिए BSA धारा 63 (पुरानी साक्ष्य अधिनियम धारा 65B) का प्रमाणपत्र माँग सकती है। ध्यान रखें, आयकर कानून ₹20,000 या उससे अधिक का उधार नकद लेने पर रोक लगाता है — आगे से उधार बैंक के ज़रिए ही दें।

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लिखित में माँगें — माँग पत्र या लीगल नोटिस

स्पीड पोस्ट (ट्रैकिंग रखें) और WhatsApp / ईमेल से साफ़ और शालीन लिखित माँग भेजें: रकम, देने की तारीख़(ें), भुगतान का तरीका, पहले किए वादे, और लौटाने की उचित तारीख़। बहुत से लोग इसे अधिवक्ता के माध्यम से लीगल नोटिस के रूप में भेजते हैं। वसूली वाद के लिए नोटिस ज़रूरी नहीं, पर अक्सर इससे भुगतान या लिखित जवाब मिल जाता है — और कर्ज़ मानने वाला जवाब सबूत और समय-सीमा दोनों में मदद करता है। धमकी, गाली-गलौज, सार्वजनिक बेइज़्ज़ती या लोगों को लेकर घर पर दबाव न डालें; इससे आप पर ही आपराधिक मामला बन सकता है।

अगर उधार लेने वाले ने चेक दिया है

भुगतान के लिए दिया चेक बाउंस हो जाए तो परक्राम्य लिखत अधिनियम, 1881 धारा 138 का रास्ता है, जिसकी समय-सीमाएँ सख़्त हैं: चेक को उसकी वैधता के भीतर लगाएँ, बैंक के रिटर्न मेमो के 30 दिन के भीतर लिखित माँग नोटिस भेजें, भुगतान के लिए 15 दिन दें, और उन 15 दिनों के बाद एक महीने के भीतर मजिस्ट्रेट के सामने शिकायत दाखिल करें। यह अक्सर सबसे मज़बूत रास्ता होता है क्योंकि कानून मानता है कि चेक कर्ज़ के लिए दिया गया था (धारा 139), हालाँकि उधार लेने वाला इसे ग़लत साबित करने की कोशिश कर सकता है। मूल चेक और रिटर्न मेमो सुरक्षित रखें। चरणों के लिए हमारी चेक बाउंस गाइड देखें।

दीवानी वसूली — वसूली वाद या संक्षिप्त वाद

मुख्य उपाय ब्याज सहित पैसे की वसूली का दीवानी वाद है (CPC धारा 34), जो उस दीवानी अदालत में होता है जहाँ उधार लेने वाला रहता है या उधार दिया गया था; अदालत और कोर्ट फ़ीस रकम और आपके राज्य के कोर्ट-फ़ीस कानून पर निर्भर है। अगर दावा लिखित अनुबंध, प्रॉमिसरी नोट या तय कर्ज़ पर आधारित है, तो CPC आदेश 37 में संक्षिप्त वाद (समरी सूट) हो सकता है: अदालत ‘बचाव की अनुमति’ न दे तो प्रतिवादी बचाव नहीं कर सकता, इसलिए यह तेज़ हो सकता है। डिक्री के बाद वसूली निष्पादन (आदेश 21) से होती है — बैंक खाता, वेतन या संपत्ति की कुर्की।

लोक अदालत और मध्यस्थता — सस्ता और जल्दी

आप ज़िला विधिक सेवा प्राधिकरण में मुक़दमे से पहले की (प्री-लिटिगेशन) लोक अदालत या मध्यस्थता के लिए आवेदन कर सकते हैं। दूसरे पक्ष को बुलाया जाता है; दोनों सहमत हों तो समझौता अवॉर्ड बन जाता है, जो डिक्री की तरह अंतिम और लागू करने योग्य होता है और उसकी अपील नहीं होती। उधार के कई विवाद इसी तरह किस्तों के समझौते से ख़त्म होते हैं। वे न आएँ तो भी आप समय-सीमा के भीतर वाद दाखिल कर सकते हैं।

पुलिस शिकायत — केवल तब जब सच में धोखाधड़ी हो

उधार न लौटाना आम तौर पर दीवानी विवाद है, अपराध नहीं। धोखाधड़ी (BNS धारा 318, पुरानी IPC 420) की पुलिस शिकायत तभी बनती है जब उधार लेने वाले ने शुरू से ही धोखा दिया हो — जैसे झूठी पहचान, फ़र्ज़ी काग़ज़, या कई लोगों से बिना लौटाने की नीयत के पैसा लेना। सुप्रीम कोर्ट ने कई बार कहा है कि केवल लौटाने का वादा तोड़ना अपने आप में आपराधिक मामला नहीं बनाता, और पुलिस अक्सर ऐसी शिकायतें नहीं लेती। वसूली के लिए झूठा या बढ़ा-चढ़ाकर आपराधिक केस करना उल्टा पड़ सकता है।

राज्य के साहूकारी कानून और ब्याज

अगर आप पैसा उधार देना धंधे की तरह करते हैं (नियमित रूप से, कई लोगों को, ब्याज पर), तो ज़्यादातर राज्यों में साहूकार लाइसेंस ज़रूरी है और ब्याज की सीमा तय है — जैसे महाराष्ट्र मनी-लेंडिंग (रेगुलेशन) एक्ट, 2014 या कर्नाटक मनी लेंडर्स एक्ट, 1961 — और बिना लाइसेंस वाले साहूकार को अदालत से वसूली में दिक़्क़त हो सकती है। किसी परिचित को एक बार दिया दोस्ताना उधार आम तौर पर ‘साहूकारी का धंधा’ नहीं होता। ब्याज तय हुआ हो तो वसूल हो सकता है; वरना अदालत CPC धारा 34 के अनुसार ब्याज तय करती है। नियम राज्य के अनुसार अलग हैं, इसलिए अपने राज्य का कानून देखें।

अधिवक्ता कैसे मदद कर सकता है

हम नोटिस नहीं भेजते, वाद या शिकायत दाखिल नहीं करते, और उधार लेने वाले या पुलिस से संपर्क नहीं करते। अधिवक्ता एक सुविधा प्लेटफ़ॉर्म है, लॉ फर्म नहीं। हम केस दाखिल नहीं करते, किसी प्राधिकरण के सामने उपस्थित नहीं होते, और किसी परिणाम का वादा नहीं करते। स्वतंत्र अधिवक्ता से सामान्य मार्गदर्शन के लिए ‘अधिवक्ता से पूछें’ पर अपनी स्थिति लिखें, या तथ्यों और काग़ज़ों को व्यवस्थित करने के लिए AI सहायक से शुरू करें। केवल शैक्षिक जानकारी — औपचारिक कानूनी सलाह नहीं।

अक्सर पूछे जाने वाले प्रश्न

दोस्त को दिया उधार वापस लेने की समय-सीमा क्या है?
आम तौर पर उधार देने की तारीख़ से तीन साल (परिसीमा अधिनियम, 1963 अनुच्छेद 19)। तीन साल पूरे होने से पहले कर्ज़ की लिखित, हस्ताक्षरित स्वीकृति या आंशिक भुगतान हो तो नई अवधि शुरू होती है (धारा 18 और 19)।
मैंने नकद उधार दिया, कोई काग़ज़ नहीं है। क्या फिर भी वसूली हो सकती है?
कठिन है, पर दूसरे सबूतों से उधार दिखा सकें तो संभव है — गवाह, और ख़ास तौर पर बाद के संदेश या कॉल जिनमें उधार लेने वाला रकम माने या लौटाने का वादा करे। ऐसी चैट सँभालकर रखें, डिलीट न करें।
क्या उधार मानने वाला WhatsApp संदेश मान्य सबूत है?
इलेक्ट्रॉनिक संदेश सबूत के रूप में मान्य हैं; अदालत भारतीय साक्ष्य अधिनियम (BSA) धारा 63 (पुरानी साक्ष्य अधिनियम 65B) का प्रमाणपत्र माँग सकती है। हस्ताक्षरित लिखित स्वीकृति समय-सीमा भी बढ़ा सकती है।
कोई पैसा न लौटाए तो क्या पुलिस में शिकायत कर सकते हैं?
आम तौर पर नहीं — उधार न लौटाना दीवानी विवाद है। धोखाधड़ी (BNS धारा 318, पुरानी IPC 420) की शिकायत तभी बनती है जब शुरू से धोखा हो, जैसे झूठी पहचान या फ़र्ज़ी काग़ज़।
उधार लेने वाले का दिया चेक बाउंस हो गया। अब क्या करें?
बैंक के रिटर्न मेमो के 30 दिन में लिखित माँग नोटिस भेजें, भुगतान के लिए 15 दिन दें, और भुगतान न हो तो उसके बाद एक महीने में NI Act धारा 138 की शिकायत दाखिल करें। मूल चेक और मेमो सँभालकर रखें।
संक्षिप्त वाद (समरी सूट) क्या है?
लिखित अनुबंध, प्रॉमिसरी नोट या तय कर्ज़ वाले दावों के लिए CPC आदेश 37 का तेज़ दीवानी वाद। प्रतिवादी को बचाव के लिए अदालत की अनुमति लेनी होती है; अनुमति न मिले तो अदालत डिक्री दे सकती है।
क्या वसूली वाद से पहले लीगल नोटिस ज़रूरी है?
निजी वसूली वाद के लिए नहीं, पर लिखित माँग या लीगल नोटिस से अक्सर भुगतान या स्वीकृति मिल जाती है और यह दिखता है कि आपने सुलझाने की कोशिश की। कुछ मामलों में नोटिस ज़रूरी है, जैसे चेक बाउंस (धारा 138) या सरकार के ख़िलाफ़ वाद (CPC धारा 80)।

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